बुधवार, 23 मई 2012

डॉ. मन्तेना की रसोई का परिचय

 
लेखक परिचय:

मैं राम गोदार, हैंदराबाद का निवासी हूँ। मैं डॉ. मन्तेना सत्यनारायण राजु जी का अनुयायी हूँ। दूसरे शब्दों में, आप मुझे उनका एकलव्य शिष्य कह सकते हैंं। डॉ. एम. एस. राजु के प्राकृतिक जीवन विधान शैली का अनुसरण करके मैंने अपने स्वास्थ्य में भरपूर लाभ प्राप्त किया। उनके निस्वार्थ कार्यों से प्रेरित होकर, मैंने अंग्रेजी भाषा में तीन ब्लॉग. - न्याचुरल वे ऑफ लिविंग, मन्तेनास किचन तथा न्युट्रिशिय्स फूड्स आदि इन्टरनेट पर प्रकाशित किया था।

उन तीन ब्लॉगों को प्रकाशित करने का मुख्य उद्देश्य तेलुगु भाषियेत्तर लोगों तक डॉ. एम. एस. राजु के उपदेशों को पहुँचाना था।

वे तीनों ब्लॉग अंग्रेजी में काफी सफल रहे। देश-विदेश के पाठकों ने काफी सहराया। इस सफलता ने मुझे इस ब्लॉग. को हिन्दी पाठकों के समक्ष लाने की प्रेरणा दी।

आशा करता हूँ कि यह ब्लॉग. "डॉ. मन्तेना की रसोई" भी आप सबका प्रेम और आदर प्राप्त करेगा।

ब्लॉग परिचय:

इस ब्लॉग में आगे बढने से पहले मैं " डॉ. मन्तेना की रसोई" का परिचय देना आवश्यक समझता हूँ। अंतत: मन्तेना की रसोई हैं क्या? इस से आप क्या आशा कर सकते हैंं? यह ब्लॉग किन लोगों को लुभायेगा?

सबसे पहले मैं डॉ. मन्तेना सत्यनारायण राजु के बारे में कुछ शब्द कहना चाहुँंगा। क्योंकि वे हमारे ब्लॉग के मुख्य पात्र हैंं। वे आन्ध्रप्रदेश के एक प्रमुख प्रकृति चिकित्सक और समाज सेवी हैंं। पिछले पंद्र्ह वर्षों से उन्होंने समाज में अपने प्राकृतिक जीवन विधान के उपदेशों से लोगों में स्वास्थ्य के प्रति चेतना लाने का सराहनीय प्रयास कर रहे हैंं।

अब वे आंध्रप्रदेश के लोगों के लिए एक पारिवारिक सदस्य बन चुके हैंं, जो प्रति दिन टी.वी. पर अपने प्राकृतिक जीवन विधान के सूत्रों का उपदेश देते हुए दिखाई देते हैंं। आज डॉ. एम. एस. राजु इन्टरनेट जगत में भी बडे प्रसिद्ध होते जा रहे हैंं। वास्तव में डॉ. राजु को इन्टरनेट की अधिक जानकारी न होने के कारण वे इस से परे ही रह्ते हैंं। परन्तु उनके प्रशंसकों ने ’याहू’ वेबसाइट पर एक ग्रूप चला रखा हैं, जिस में आप स्वास्थ्य संबंधित कई सूचनाएँ प्राप्त कर सकते हैंं। मैंने भी "फेसबूक" पर "डॉ. मन्तेना सत्यनारायण राजु" शीर्षक एक फैन पेज प्रारम्भ किया है, जहाँ आप को डॉ. राजु के उपदेशों के साथ-साथ डॉ. राजु के विजयवाडा स्थित प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र की सूचनएँ एवं डॉ. राजु के उपदेश कार्यक्रम संबंधि सूचनाओं से अवगत किया जायेगा। अधिक सूचना के लिए आप लॉग ऑन कर सकते हैं -www.naturalwaysofliving.blogspot.com


अंतत: डॉ. मन्तेना की रसोई है क्या?

यदि हम ध्यान दें तो अवगत होगा कि आज हमें आने वाले आधे से अधिक रोग हमारी अनुचित जीवन शैली से होते हैं। अनुचित जीवन शैली का अर्थ है कि शारीरिक परिश्रम का न होना और अपौष्टिक भोजन का सेवन करना। हृदय रोग, रक्त चाप, मोटापा, मधुमेह, जीर्न रोग, कब्ज़ आदि रोग अनुचित भोजन करने और शारीरिक परिश्रम न करने से होते है। डॉ. राजु ने अपने अध्ययन में रसोई में उपयोग होने वाले सात ऐसी वस्तुओं को पाया जो हर व्यक्ति के स्वास्थ्य पर प्रभाव डालता है और उनको स्वास्थ्य का शत्रु बताया। वे स्वास्थ्य के शत्रु हैं: नमक, चीनी, तेल, घी, इमली, लाल मिर्च पॉउडर और मसाले। यह सात रसोई में छिपे शत्रु धीरे-धीरे दीमक की तरह हमारे शरीर में घुस कर हमारे शरीर को खोखला कर रहे हैं। जब पता लगता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। एक बार यदि हमें ऊपर बताए रोग आजाएँ तब हमें इन शत्रुओं को त्याग ने पर भी कुछ न होगा। डॉ. राजु ने अपने प्राकृतिक जीवन विधान में, रसोई में प्रयोग होने वाले इन सात वस्तुओं का निषेध कर; एक ऐसे ऐतिहासिक पाक कला की रचना की जो बिना नमक, चीनी, घी, तेल, इमली, लाल मिर्च पॉउडर और मसाले के होता है। इस पाक कला में आहार न केवल स्वादिष्ट और पौष्टिक बल्कि रोग रहित होता है। ऐसा भोजन करने से न केवल रोग दूर होते हैं बल्कि रोग आने से भयभीत होते हैं। उन्होंने अपने इस अनूठे पाक शास्त्र में उन सात रुचियों के बदले में उन वस्तुओं के स्थानापन्न (सब्स्टिट्यूट) पदार्थों का बडी ही चतुराई से प्रयोग किया हैं। इस पाक कला को हमारे समक्ष लाने के लिये कई वर्ष लगे। डॉ. एम. एस. राजु और उनकी श्रीमती विशाला राजु के निरंतर परिश्रम का फल हैं यह ब्लॉग "डॉ. मन्तेना की रसोई" यदि आप इस ब्लॉग में बताये जाने वाले व्यंजनों को बनायेंगे, तब आप को पता चलेगा कि इस पाक कला के रूपान्तरण में उन महान दम्पत्तियों ने कितना परिश्रम लगाया है।

डॉ. राजु के प्राकृतिक जीवन विधान की नींव और डॉ. मन्तेना की रसोई का जन्म:

आप सब ने प्राकृतिक चिकित्सा के बारे में सुन रखा होगा। प्राकृतिक चिकित्सा एक ऐसा वैद्य शास्त्र है, जहाँ रोगी की चिकित्सा बिना किसी औषधि के, प्राकृतिक रूप से किया जाता है। इस विधान में आहार ही औषधि का काम करता है। पिछले कुछ वर्षों से इस चिकित्सा विधान का अत्यंत आदर हो रहा है। वास्तव में यह चिकित्सा विधान आदि काल से चला आ रहा है। आधुनिक एलोपेथी चिकित्सा विधान के समक्ष इसका आदर भले ही कम हो परंतु इसका महत्व और गरिमा कभी कम न था, रहा हैं और रहेगा! मानव आज पुन: मूल की ओर बढ़ रहा है। आदि काल से इस वैद्य विधान के सफलता का कारण है, इस वैद्य विधान में किसी तरह का पार्श्व परिणाम (सैड एफेक्ट) न होना।
आज भारत में कई प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र स्थापित हो रहे हैं। हाल ही में डॉ. एम. एस. राजु ने आन्ध्रप्रदेश के विजयवाडा नगर में देश का सबसे बडा प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र की स्थापना की है।

इन प्राकृतिक चिकित्सा केंद्रों में चिकित्सा प्राप्त करने वाले रोगियों को बिना किसी औषधि, सूई और शस्त्र चिकित्सा के, मात्र उबले हुए सब्जी, फल, रोटी आदि के साथ पानी, मिट्टी, सूर्य स्नान, योग आदि करवा कर रोगों का उपचार किया जाता है।


परन्तु डॉ. एम. एस. राजु ने यहाँ पर एक विशेष बात पर ध्यान दिया। जब तक रोगी इन चिकित्सा केंद्रों में रह कर चिकित्सा प्राप्त कर रहा है, वहाँ दिये जाने वाला पौष्टिक और रोग रहित आहार खाकर, स्वस्थ होकर घर जा रहा है। जैसे ही घर पहुँचता है, वह फिर सामान्य हानिकारक भोजन लेने लगता है और पुन: रोगों को आमंत्रित करता है। इस का एक साधारण सा कारण है। जब वह चिकित्सा केंद्र से स्वस्थ होकर घर आता है, पहले कुछ दिन तक आश्रम में बताये गये भोजन को ही खाने लगता है। परंतु इस प्रक्रिया को वह दीर्घ काल तक कार्यरत नहीं कर पाता। इसका मुख्य कारण, घर के अन्य सदस्य उसके साथ बैठ कर, नमक, चीनी, घी, तेल, इमली, लाल मिर्च पॉउडर और मसाले से लदा हुआ भोजन करते हैं और उस व्यक्ति को फीका, उबला हुआ भोजन देते है। पहले कुछ समय तक तो बेचारा अपने चित्त को मार कर वही फीका भोजन लेने लगता है। परंतु कुछ दिन बाद उसका चित्त भी साथ नहीं देता और वह पुन: हानिकारक भोजन खाने पर विवश हो जाता है। जो व्यक्ति, आश्रम में महिना-डेढ महिने तक फीका उबला हुआ भोजन बिना किसी कष्ट के खाया करता था, वह आज घर पर कठिनाई से दस-पन्द्रह दिन ही खा पा रहा है। इस का प्रमुख कारण यह है कि, आश्रम में उसके सहवासी सभी, एक ही प्रकार का भोजन लेते हैं और तो और घर पर बनने वाले मसालेदार तथा हानिकारक भोजन का गंध भी सूँघने तक नहीं मिलता। दूसरी ओर घर में इसके बिल्कुल विपरीत होता है। इसीलिये वह आश्रम में बताये गये जीवन शैली का लम्बे समय तक अनुसरण नहीं कर पाता।

प्राकृतिक चिकित्सा की सफलता वास्तव में रोगी के मनोबल पर आधारित होता है। डॉ. राजु ने पाया कि प्राचीन काल में कई सारे ऋषि-मुनी तपस्या के लिये अपने घर को त्याग कर वन की ओर प्रस्थान किया करते थे, ताकि उनका गृह्स्थ जीवन उनकी तपस्या में बाधा उत्पन्न न करे। जब उन जैसे महान ऋषि-मुनियों को घर बैठे अपने चित्त को नियंत्रित करने में इतनी कठिनाई होती है तो भला एक साधारण सा मानव कैसे कर पाएगा?

इस मूल कारण से डॉ. मन्तेना का प्राकृतिक जीवन विधान का जन्म हुआ। डॉ. मन्तेना का प्राकृतिक जीवन विधान समाज को रोग मुक्त रखने का एक सरल और सहज मार्ग हैं। "डॉ. मन्तेना की रसोई" उनके प्राकृतिक जीवन विधान का अभिन्न अंग है।

इस ब्लॉग से पाठक क्या आशा कर सकता है?

जो लोग घी या तेल में तले हुए और तीखा-मसालेदार भोजन करना पसंद करते हैं, उन्हें अवश्य ही यह ब्लॉग निराश करेगा। फिर भी मैं आशा करता हूँ कि वे लोग भी इस ब्लॉग में बताया जाने वाला प्राकृतिक, पौष्टिक और स्वादिष्ट भोजन बनाकर खायेंगे और आनंद लेंगे। जो व्यक्ति अपने स्वास्थ्य से प्रेम करता है, जो अपनी भूल को सुधारना चाहता है, उसे यह ब्लॉग अत्यंत प्रिय लगेगा। इस ब्लॉग में हम स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाले सभी व्यन्जन आप तक लाने का पूरा प्रयास करेंगे।

इस ब्लॉग का मूल उद्देश्य:

वैसे तो आपने इन्टरनेट पर कई सारे रसोई के वेबसाइट्स और ब्लॉग्स देखे होंगे, परन्तु आपने इस तरह का अनूठा ब्लॉग या वेबसाइट नहीं देखा होगा जो कि स्वास्थ्य का प्रचार करे। ऐसी रसोई की कोई ब्लॉग या वेबसाइट इन्टरनेट पर नहीं मिलेगी जिसमें व्यंजनों को बिना नमक, चीनी, घी, तेल, इमली, लाल मिर्च पॉउडर, मसाले के बनाये गये हो। यह ब्लॉग उतना ही अनूठा है जितने अनूठे एम. एस. राजु जी स्वयं हैं।

आप को लगता होगा कि डॉ. एम. एस. राजु जब इस क्षेत्र में इतना बढ़िया सा काम कर रहे हैं तो फिर इस ब्लॉग कि क्या आवश्यकता है? इस के दो कारण हैं। डॉ. एम. एस. राजु समस्त आंध्रप्रदेश में घूम कर तथा टी.वी., सी.डी, डी.वी.डी. के माध्यम से उपदेश देते हुए, प्राकृतिक जीवन विधान का निरंतर प्रचार कर रहे हैंं। परन्तु उनके उपदेश तेलुगू भाषी लोगों तक ही सीमित होकर रह गया है। जब मैंने कुछ स्थानीय हिन्दी भाषी मित्रों से उनके उपदेशों के बारे में जानना चाहा तो मुझे पता लगा कि ९०% से अधिक स्थानीय हिन्दी भाषी लोग उन्हें समझ नहीं पाते, तो ऐसे में अन्य देश वासियों तक उनके उपदेश कैसे पहुँचेंगे? इस कारण मैं ने डॉ. एम. एस. राजु के उपदेशों को तेलुगू भाषियेत्तर लोगों तक पहुँचाने के लिये अंग्रेजी में प्रारंभ में बताये गये तीन ब्लॉगों की रचना की थी। उनकी सफलता के बाद हिन्दी भाषी लोगों तक उनके उपदेशों को पहुँचाने का विचार आया। इसका फल स्वरूप है यह "डॉ. मन्तेना की रसोई"। मैं और मेरे परिवार ने डॉ. एम. एस. राजु के प्राकृतिक जीवन विधान का अनुसरण कर, स्वास्थ्य में अत्यंत लाभ प्राप्त किया है। इस लाभ को आप सब तक पहुँचाने का एक छोटा सा प्रयास है यह ब्लॉग। डॉ. एम. एस. राजु ने उनके एक पुस्तक में कहा था कि यदि आपका घर इस जीवन विधान से प्रकाशित हो जाये तो दूसरे के घर को प्रकाशित करने का प्रयास करें। आशा है, यह मेरा छोटा सा प्रयास आप सबके घरों को प्रकाशमय बनायेगा और बदले में आप भी उस प्रकाश को आगे फैलयेंगे।

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